पूस्तक का नाम:- एक दुआ की मौत
पूस्तक का नाम:- एक दुआ की मौत
लेखक:- फारूक अंसार
अनुवादक:- मोहम्मद शब्बिर अली
गिली लकड़ी सुखी लकरी
कई रोज़ की मूसलाधार बारिश ने ज़मीन पर हर सामंत एक सफ़क आयना पीछा दिया था ईस के घर में भी जगह बॉ जगह फ़ुश छपर से पानी टपक टपक कर जमा हो गया था घर की दीवारें भी कुछ नीचे से कुछ ऊपर से गिली हो गयी थी। ईस वजह से एक तरफ़ की दीवार ढह गयी थी सूरज की रोशनी ईस तरह आयी तो घर में ज़िन्दगी की किरने फट परे।
कलाश्री ने अपने बीमार बेटे को उम्मीद भरी नज़रों से देखा ईसे इसमें ज़िन्दगी के रमाक नज़र आयीं इस ने ख़ामोशी की ज़बान में अपने पति जीतन माँझी से कहा जाओ डॉक्टर से दावा ले आओ
जीतन माँझी तेज़ी से दूसरे कमरे में गया इसमें रखे लकरियाँ का जायज़ा लिया ओर भगवान का शुक्रिया अदा किया लकरियाँ गिली ना हुयी थी इसने कलेश्री को आवाज़ दिया ओर दोनो मिलकर लकरियाँ का गठा बनाने लगे
ज़रा जल्दी जल्दी करो सुक़ुर-सुक़ुर मत करो जीतन माँझी ने अपने पत्नी कलेश्वरी से कहा अभी हथिया नवछतर चल रहा है बारिश कभी भी शुरू हो सकती है।
अब बारिश नहीं हो गी कलाश्री ने यक़ीन से अंगुलियाँ पर ज़ोर कर कहा हथिया नवचहतेर सोला दिन का बनता है। मंगल मंगल आठ फिर मंगल पंद्रह ओर आज बुध है सोला रोज़ पूरे हो गए
अच्छा अच्छा जियादा हिसाब किताब मत लगाओ जल्दी जल्दी हाथ बँटाओ जीतन माँझी अपनी पत्नी कलाश्री से कहा। महावीर होटेल को ही सारे लकरियाँ बेच आओ गे
ये पति पत्नी दूसरे …. की तरह क़रीब के जंगल से सुखी लकरियाँ काट कर क़रीब के छोटे क़स्बे में बेच कर अपना गुज़ारा बसर करते अब जंगल में सुखी लकरियाँ ढूँढने से भी नहीं मिलती इस लिए हरे भरे पेड़ों फ़ॉरेस्ट ऑफ़िसर के मदद से काट कर जंगल में ही सूखने के लिए दस पंद्रह दिन छोड़ इस दरमियान पहले की कटी लकरियाँ को ला कर बेचते मगर अब जंगल भी दूर हो गया था इस लिए दूसरे तमाम हरिजन की तरह सूबह को गया-धनबाद लोकल ट्रेन से दो तीन स्टेशन दूर डलवा,बसकटवा, कलबाग तक चले जाते ओर वापस आसनसोल-बनारस पैसेंजर ट्रेन से लौटते हुए लकरियाँ का गठा बोगी के खिड़कियों के राड से लटका देते कुछ बोगी के जोड़ो के दरमियान रख देते
इस काम में ट्रेन ड्राइवर,गार्ड,स्टेशन मास्टर,आरपीएफ़ जवान सभी कमीशन लेकर मदद करते। जीतन माँझी ओर कलेश्वरी दोनो पति पत्नी पहाडपुर स्टेशन उतरते और अपनी लकरियाँ फ़तेहपुर, करियदपुर,रूपिन,चमरुचक,जम्हेता क़रीब के गाँव ओर क़स्बों बेच देते कभी कभी तो पहरपुर स्टेशन में ही मारा मारी हो जाती बीस रुपये का गठरी तीस रुपये बिक जाती।
ईस रोज़ जैसे ही दोनो ट्रेन से उतरे आँधी-तूफ़ान ओर बारिश ने घेर लिया वो जल्दी जल्दी रिक्शा से किसी तरह लकरियाँ को भीगने से बचाते हुए घर आ गए बारिश जो सुरू हुयी तो छूटने का नाम ही नहीं ले रही थी। जैसे जैसे शाम हो रही थी
कलेश्री फ़िकर मंद होती जा रही थी कियूँ की घर में राशन ज़रूरत भर नहीं था रात सूबह ओर दोपहर का खाना शाम को ही बना लेती थी कुछ अपने लड़के के लिए छोड़ जाती कुछ दोनो अपने लिये ले जाते शाम को अगर राशन नहीं आया तो कल इनलोगो जंगल जाना मुश्किल हो जाये गा
कलेश्री ने एक दिया जलाया ओर अपने बेटे करण के सारे कपड़े उतारने लगी- अरे इसके कपरे कियूँ उतार रही हो जीतन ने हैरत भारी निगाह से बोला।
इसे
नंगा कर के आँगन
में दिया जलाऊँगी कलेश्री कहा जो लङका ननिहाल
में पैदा होता है वह नंगा
हो कर बारिश में
भीग कर दिया जलायें
तो बारिश रुक जाती है। बारिश रुकी
नहीं मगर करण को नमूनिया ओर
साँस में समस्या होने लगा रात में इसके घर में रोने
पिटने जैसे हालात हो गये बाज़ार
से दावा लाना तो नामुमकिन था
इस लिए लकरियाँ जला कर रात भर
सरसों के तेल से
मालिश करते रहे। सूबह होते ही जीतन ने
बड़े किसान रघु यादव घर भागते हुए
जा कर अपना दुखड़ा
सुनाया ओर सूद पे
कुछ रुपया ले आया करण
के दावा के साथ राशन
ओर दारू भी ले आया
शाम को दारू नहीं
ना पीने से इसका बदन
ज़ख़्म की तरह दर्द
कर रहा था इसने करन
को दावा खिलायी ओर दोनो पति
पत्नी दारू पीकर सारे जहाँ के दुःख दर्द
से बेगाना होकर सो गाये।
जब होश आया तो देखा बारिश मूसलाधार हो रही थी। ओर करन का बदन बुखार से तप रहा है ओर ठण्ड से काँप रहा है दोनो को कुछ समझ में नहीं आ रहा था के इसे किया करे जीतन ने करन के हलक में दारू के कुछ चन्द घूँट हलक में उतार दिए की गर्मी आ जाये गी। एसा हूवा नहीं इसके हालात ओर बिगाड़ गया सूरज ने जब अपनी आँखें खोली तो करन ने भी अपने आँखे खोल दिये कलेश्वरी की ममता इसके चेहरे पे चमकने लगी ओर इसने अपने पति जीतन माँझी को बोली की वो जल्दी बाज़ार जाये ओर लकरियाँ बेच कर इसकी दावा ले आयें जीतन लकरियाँ को लेकर बाज़ार जाने की तैयारी कर ही रहा था की सामने से बारे किसान के आदमी आते नज़र आये और आते ही कहा की सारी लकरियाँ दे दो कियूँ के बारे किसान रघु बाबू का कल रात देहांत हो गया है बारिश के वजह से दाह संस्कार नहीं हो सका इसके लिए लकरियाँ भी नहीं है किसी दुकान में बारिश ने सब ख़त्म कर दिया दोनो पति-पत्नी इनलोगो लर्कियाँ ले जाते हुए देखते रह गये इनसे ये नहीं कहा गया की कुछ रुपये दे दो करन का दवाइयाँ ला सके जीतन ने रुपये के लिए कई दरवाज़े खट खटाये मगर इसे कहीं से रुपया नहीं मिला।
घर पर कुलेश्वर के रोते पिटते बताया कि करन अब नहीं रहा …इनलोगो के रोने धोने का गाँव के लोगों ने बारे किसान रघु बाबू के मौत का मातम समझा कोई पूछने तक नहीं आया ऐसे भी गाँव के एक किनारे पर बसा एक-दो घर हरिजन के यहाँ कौन आता जाता है जीतन के सामने एक बहुत बड़ा मुश्किल, करन का दाह संस्कार का था वो कहाँ से लकरियाँ लाये के इसका दाह संस्कार हो…
कियूँ की ज़मीन गिली थी आसमान गिला था ज़मीन और आसमान के बीच फ़ुश का मकान भी गिला था इसने अपने मायूसी भारी आँख से देखा तो उसे हर चीज़ गिला नज़र आ रहा था बारे किसान रघु बाबू के चिता में आग दे कर लौटते हुए चन्द लोगों ने जीतन के दरवाज़े पर उसे तसल्ली दे गए के बारे किसान रघु बाबू के लिए रोने से अब कोई फ़ायदा नहीं इनके आत्मा के शान्ति के लिये प्रथना करो जीतन ने दूर मरघाट पे जलते हुए बारे किसान रघु यादव की जलती चिता को ग़ौर से देखा और तेज़ी से घर में जा कर करन की लाश को सिने से लगाये दोनो पति-पत्नी मरघाट की तरफ़ बढ़ गये…..
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